भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, लेकिन भारत की राजनीति में परिवारवाद यानी “वंश की राजनीति” तेजी से बढ़ती जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में कुल 5,254 सांसद, विधायक और विधान परिषद सदस्य हैं। इनमें से 1,174 लोग किसी न किसी राजनीतिक परिवार से आते हैं। यानी हर पांच में से एक नेता किसी न किसी पुराने नेता का बेटा, बेटी, भाई या रिश्तेदार है।
रिपोर्ट बताती है कि देश की राजनीति में आम लोगों की बजाय कुछ परिवारों का कब्जा लगातार बढ़ रहा है, जिनमें 149 परिवारों में एक से ज्यादा नेता देश की राजनीति में सक्रिय हैं।
कांग्रेस में सबसे ज़्यादा वंशज, बीजेपी भी पीछे नहीं
रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस में वंशवाद सबसे ज्यादा है।पार्टी के 857 नेताओं में से 285 लोग (33%) किसी न किसी राजनीतिक परिवार से आते हैं। यानी कांग्रेस के हर तीन में से एक नेता पुराने नेता के परिवार से आता है।
वहीं बीजेपी, जो खुद को परिवारवाद के खिलाफ बताती है, उसके भी 18.6% नेता वंशवादी हैं। जबकि देश में कुल 2,078 नेताओं में से 387 का राजनीति में पारिवारिक बैकग्राउंड रहा है। यानि देश की दोनों ही बड़ी पार्टियों में यह चलन गहराई तक मौजूद है।
क्षेत्रीय पार्टियों में परिवार का और ज्यादा असर
रिपोर्ट बताती है कि राष्ट्रीय दलों की तुलना में क्षेत्रीय पार्टियों में परिवारवाद और भी ज्यादा गहराया हुआ है। रिपोर्ट के कुछ अहम आंकड़े इस तरह हैं-
- समाजवादी पार्टी (SP) – 34.8%
- जेडीयू (JDU) – 34.5%
- तेलुगु देशम पार्टी (TDP) – 31.2%
- राजद (RJD) – 30.6%
- डीएमके (DMK) – 17.4%
वहीं आम आदमी पार्टी (AAP) में वंशवाद सबसे कम दिखा- केवल 8.3% नेताओं के पारिवारिक रिश्ते सामने आए हैं। रिपोर्ट यह बताती है कि दक्षिण से लेकर उत्तर तक, हर जगह राजनीति कुछ परिवारों के हाथ में सिमटती जा रही है।
बिहार: वंशवाद का सबसे बड़ा उदाहरण
बिहार में वंशवाद की पकड़ सबसे मजबूत दिखाई देती है। लालू प्रसाद यादव की पार्टी RJD के 42% विधायक परिवार से हैं। यानि लगभग आधे विधायक किसी न किसी राजनीतिक घराने से जुड़े हैं।
जबकि जेडीयू में 36% और बीजेपी में लगभग 21% विधायक वंशज हैं।
कांग्रेस के पास बिहार में सिर्फ चार विधायक वंशज हैं।
बिहार की राजनीति पर राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार में अब राजनीति “परिवार की परंपरा” जैसी हो गई है। नेता के बाद उसका बेटा या बेटी सीधा राजनीति में उतरता है।
संसद और विधानसभाएं भी वंशवाद से अछूती नहीं रहीं
रिपोर्ट के मुताबिक
संसद (लोकसभा + राज्यसभा) में करीब 27% सांसद वंशज हैं।
राज्य विधानसभाओं में लगभग 20% विधायक किसी राजनीतिक घराने से आते हैं।
इससे साफ है कि “परिवार आधारित राजनीति” अब स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक फैल चुकी है।
क्यों बढ़ रहा है वंशवाद ?
वंशवाद केवल संयोग नहीं है, इसके पीछे कई वजहें हैं:
- 1. नाम और पहचान का फायदा: जनता उन चेहरों को आसानी से पहचान लेती है जिनका परिवार पहले से राजनीति में है। इससे वोट मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
- 2. पैसा और संसाधन: राजनीतिक परिवारों के पास चुनाव लड़ने के लिए ज़रूरी साधन पहले से होते हैं। जैसे- संगठन, संपर्क और फंडिंग।
- 3. पार्टी की जीत की रणनीति: पार्टियां सोचती हैं कि “मशहूर नाम” से जीतने की संभावना ज़्यादा है, इसलिए टिकट ऐसे ही लोगों को दिया जाता है।
- 4. राजनीतिक कल्चर: कई राज्यों में यह आम सोच बन चुकी है कि नेता का बेटा या बेटी राजनीति में आना “स्वाभाविक” है।
लोकतंत्र पर वंशवाद की राजनीति का असर
विशेषज्ञ मानते हैं कि वंशवाद से नई प्रतिभाओं को मौका कम मिलता है। योग्य और मेहनती लोग पार्टी में ऊपर नहीं पहुंच पाते। उनके लिए आगे के रास्ते बंद हो जाते हैं और धीरे-धीरे राजनीति कुछ परिवारों के इर्द-गिर्द सिमट जाती है, जिससे लोकतंत्र की असली भावना- “हर किसी को बराबर मौका” यह नहीं मिल पाता है और धीरे-धीरे लोकतंत्र “जनता का शासन” से “परिवार का शासन” बन जाता है। इससे जनता के पास असली विकल्प कम रह जाते हैं। आज देश के ज्यादातर राज्यों में ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई है।
यह रिपोर्ट बताती है कि भारत में अब राजनीति सिर्फ विचारों की नहीं, बल्कि परिवारों की लड़ाई बनती जा रही है। कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक और उत्तर से दक्षिण तक- लगभग हर दल किसी न किसी परिवार के असर में है।







