---Advertisement---

प्रकृति प्रेम, लोक जीवन और आस्था का अनूठा संगम है महापर्व छठ

---Advertisement---

केलवा के पात पर उगे लन सुरुजमल झांके झुकेके करेलू छठ बरतिया से झांके झुके

शारदा सिन्हा की ये लाइनें कानों में गूंजते ही देश-विदेश में रह रहे हर उस शख़्स के दिल को छू जाती हैं, जिसकी रूह अपने गांव-घर से जुड़ी हुई है। और हो भी क्यों ना, जो गीत देश के एक बड़े हिस्से के लोगों के इमोशन से जुड़ी हुई हो। जो साल भर उनके दिल में घर किए रहते हैं। यही वो समय होता है जब बिहार, झारखंड, यूपी और बंगाल के लोग अपने घर लौटने की बेचैनी महसूस करते हैं।

छठ एक ऐसा पर्व है जिसकी याद में पूरा साल बीतता है। हर किसी के लिए यह इंतजार का पर्व है कि खरना के बाद अगली शाम कब आएगी, जब हम शाम के अर्घ्य अर्पित करेंगे, और फिर सुबह कब होगी, जब घाट पर खड़े होकर सूरज को अर्घ्य देंगे। यही वो पल हैं जो बिहारवासियों से काफी गहराई से जुड़े होते हैं, और मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु या विदेशों में काम करने वाले बिहारी इस समय सबसे ज्यादा बेचैन रहते हैं। ऑफिस में बैठा हर कोई मैनेजर से यही कहता है, सर दो दिन की छुट्टी चाहिए छठ मनाने घर जाना है।

कई बार लोगों को लम्बी छुट्टी नहीं मिलती, तो वे रात भर ट्रेन या बस पकड़ने के लिए संघर्ष करते हैं। कोई 36 घंटे की यात्रा करता है, कोई ट्रेन में खड़े होकर भी सफर तय करता है, लेकिन मन में सिर्फ एक ही ख्याल रहता है, शाम के अर्घ्य से पहले घर पहुंचना है।

यह वही भावना है जो हर बिहारी को अपनी मिट्टी और संस्कृति से जोड़ती है। छठ पूजा उनके लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं है, बल्कि भावनाओं की वो डोर है जो हर परदेस में बसे बिहारी को अपने गांव की ओर खींच लाती है। जब ट्रेन बिहार की सीमा में प्रवेश करती है, तो दिल में एक अलग-सी खुशी उमड़ पड़ती है।

नहाय-खाय के साथ चार दिवसीय महापर्व छठ का अनुष्ठान आज से

नहाय-खाय: छठ पूजा की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस दिन माताएं गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करती हैं। इसके बाद मिट्टी के चुल्हे पर नहाय-खाय का प्रसाद बनाया जाता है, जिसमें अरवा चावल, अरवा चने की दाल और कद्दू की सब्जी मुख्य रूप से विधि-विधान से बनाया जाता है। इसी कारण इसे बिहार के कई क्षेत्रों में कद्दू भात भी कहा जाता है।

खरना: इसी पर्व के दूसरे दिन को खरना पूजा कहा जाता है। दूसरे दिन माताएँ पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं। शाम को सूर्यास्त के बाद चावल की खीर, पूरी और केले का प्रसाद बनाकर पूजा करती हैं, और फिर पूरा परिवार मिलकर यही प्रसाद खाता है।

संध्या अर्घ्य: तीसरे दिन को संध्या अर्घ्य पूजा के नाम से जाना जाता है। यह छठ का सबसे भव्य दिन होता है। शाम के समय पूरा परिवार नदी या तालाब के किनारे जाते हैं। जहां हर घर से एक बाँस की टोकरी लाई जाती है, जिसमे सूप सजे हुए होते हैं। इस सूप को फल, ठेकुआ, नारियल और अन्य चीजों से सजाया जाता है। घाट पर पहुँचकर सभी व्रती डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। चारों ओर छठ गीत गूंजते हैं और महिलाएँ पारंपरिक वेशभूषा में सजती हैं।

उषा अर्घ्य: चौथे दिन की पूजा को उषा अर्घ्य उपासना कहा जाता है। यह दिन छठ पूजा का अंतिम दिन होता है। जहां सभी लोग सुबह होने का बेसब्री से इंतजार करते हैं ताकि फिर से छठ घाट जाकर पूजा कर सकें। सुबह होते ही सभी व्रती और परिवारजन घाट पर पहुँचते हैं और उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करके पूजा करते हैं। यह पल बहुत ही भावनात्मक होता है, जब लोग अपने परिवार की खुशहाली, संतान की लंबी उम्र और समाज के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

तीन दिन की उपासना के बाद माताएं पारण करती हैं, यानी व्रत खोलकर खाना ग्रहण करती हैं। इसलिए इस पर्व को महापर्व कहते हैं।

छठ पूजा सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि भावनाओं, संस्कृति और मिट्टी से जुड़े रहने का अनुभव है। परदेस में बसे बिहारी भी इसे अपने घर लौटने और परिवार संग जुड़ने का माध्यम मानते हैं। तीन दिन की उपासना और अर्घ्य की भावना हर दिल में गहरी छाप छोड़ती है।

Join WhatsApp

Join Now

---Advertisement---

Leave a Comment