साल था 1979. जगह बिहार की भागलपुर। यहां घटा था क्रूर अंखफोड़वा कांड, जो देश-दुनिया और भारतीय पुलिस के इतिहास में काले अध्याय के तौर पर दर्ज है। ‘अंखफोड़वा कांड’ जिसे भागलपुर ब्लाइंडिंग केस के नाम से भी जानते हैं, इसमें पुलिस ने अपराधियों को सज़ा देने के नाम पर हिरासत में लेकर उनकी आंखों में तेज़ाब डालकर और सुवा तक चुभो दिया था। पुलिस की इस क्रूर अमानवीयता के चलते 33 लोगों का जीवन हमेशा के लिए अंधकार में डूब गया था।
यह वह दौर था जब बिहार में अपराध तेजी से बढ़ रहे थे, पुलिस पर अपराध को रोकने का दबाव था और इसे लेकर कानून व्यवस्था पर सवाल उठ रहे थे। लेकिन जनता की सुरक्षा के नाम पर पुलिस ने जो किया, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। भागलपुर का यह कांड इतिहास में एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है जिसे शायद ही कोई बिहार की जनता भुला सकती है।
जब न्याय की सनक में बेगुनाहों को मिली सजा
यह घटना उस वक्त हुई जब बिहार में कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे डॉ. जगन्नाथ मिश्र। केंद्र में भी कांग्रेस की ही सरकार थी, जिसकी कमान इंदिरा गांधी के हाथों में थी। राज्य में अपराध बढ़ रहे थे, खासकर भागलपुर, मुंगेर और आसपास के इलाकों में। चोरी, लूट और डकैती की घटनाएं आम हो चुकी थीं। पुलिस पर लगातार आरोप लग रहे थे कि वह अपराधियों पर काबू नहीं पा रही।
ऐसे माहौल में भागलपुर पुलिस ने “कठोर कार्रवाई” दिखाने की ठानी। लेकिन कानून की सीमाओं में रहकर अपराधियों से निपटने की बजाय पुलिस ने जो किया, वह बर्बरता की हद पार कर गया।
कैसे हुआ ‘अंखफोड़वा कांड’
पहली घटना अक्टूबर 1979 में सामने आई। बताया जाता है कि पुलिस ने कुछ छोटे अपराधों में लिप्त लोगों को गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद उन्हें थाने या जेल में ले जाकर हाथ-पैर बांध दिए गए। फिर पुरानी बैटरियों से सल्फ्यूरिक एसिड निकाला गया और वह उनके आंखों में डाल दिया गया। कुछ के चेहरे जला दिए गए, कई की पलकों के नीचे तेजाब बहा दिया गया।
इस कृत्य को स्थानीय पुलिस ने “कानून सिखाने” का तरीका बताया। उनका कहना था कि इन अपराधियों ने लोगों में दहशत फैला रखी थी, और उन्हें सबक सिखाना जरूरी था। लेकिन यह “सबक” पूरे तंत्र पर एक काला धब्बा बन गया।
कैसे खुलासा हुआ ‘अंखफोड़वा कांड’ का
यह मामला दबा रह सकता था अगर स्थानीय पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे उजागर न किया होता। 1980 की शुरुआत में कुछ सामाजिक संगठनों ने भागलपुर जेल का दौरा किया, जहां उन्हें कई बंदी पट्टी बांधे और दर्द में कराहते मिले। जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने बताया कि पुलिस ने उनकी आंखों में तेजाब डाला है।
इसी दौरान दिल्ली और पटना के कुछ पत्रकारों ने बिहार में बढ़ते अपराधों पर रिपोर्टिंग शुरू की जिसे इंडियन एक्सप्रेस सहित कई अखबारों ने इसे पहली बार प्रकाशित किया। धीरे-धीरे यह खबर पूरे देश में फैल गई। भागलपुर पुलिस का यह ‘खौफनाक सच’ अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक पहुंचा और भारत की छवि पर गहरा सवाल खड़ा हुआ।
पीड़ितों की हालत और उनकी कहानियां
ज्यादातर पीड़ित गरीब तबके से थे- कोई रिक्शा चालक था, कोई मजदूर, तो कोई petty thief (छोटा अपराधी) जिसके खिलाफ मुकदमा तक पूरा नहीं हुआ था। खबर में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, कई पीड़ितों ने बाद में बताया कि उन्हें थाने में हथकड़ी लगाकर बांधा गया और तेजाब डालने से पहले पुलिसवालों ने कहा-
“अब देखो, फिर चोरी करने का मन करेगा या नहीं।”
जिनकी आंखें फोड़ दी गईं, उनमें से कई ने ज़िंदगी के बाकी साल अंधेपन और गरीबी में बिताए। कुछ की तो इलाज के अभाव में मौत हो गई। जो जिंदा बचे, वे भिक्षाटन या दूसरों पर निर्भर होकर किसी तरह गुज़ारा करते रहे।
पुलिस और सरकार की सफाई
जब यह मामला सामने आया तो पुलिस और प्रशासन ने पहले इसे झूठा बताया। उनका कहना था कि अपराधियों ने जेल में आपस में लड़ाई की थी और उसी में उनकी आंखें फूट गईं। लेकिन मेडिकल जांचों ने इस दावे को गलत साबित कर दिया। डॉक्टरों की रिपोर्ट में साफ लिखा गया कि आंखों में तेजाब के निशान मिले हैं, और यह जानबूझकर किया गया कृत्य है।
बढ़ते दबाव के बीच बिहार सरकार ने जांच के आदेश दिए। कुछ पुलिस अधिकारियों को निलंबित किया गया, जिनमें डीएसपी प्रभाकर नारायण सिंह और थानेदार रामचंद्र सिंह के नाम प्रमुख थे। लेकिन जांच की रफ्तार धीमी रही और कई सालों तक यह मामला अदालतों में उलझा रहा।
सुप्रीम कोर्ट की दखल और न्याय की लंबी लड़ाई
1981 में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (suo motu cognizance) लेते हुए बिहार सरकार से जवाब मांगा। अदालत ने इसे “मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन” कहा। पीड़ितों के लिए इलाज और मुआवजे का आदेश दिया गया। धीरे-धीरे इस केस में कई पुलिसकर्मी अभियुक्त बने और कुछ को सज़ा भी सुनाई गई। हालांकि, न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी चली कि कई पीड़ितों की मौत हो गई, और कई गवाह समय के साथ गायब या कमजोर पड़ गए।
फिर भी यह केस भारत की न्यायपालिका में मानवाधिकार संरक्षण की मिसाल बन गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था —
“राज्य को अपने नागरिकों के प्रति वही जिम्मेदारी निभानी होगी जो एक संरक्षक अपने बच्चे के लिए निभाता है।”
मानवाधिकार आंदोलन और मीडिया की भूमिका
अंखफोड़वा कांड ने भारत में मानवाधिकार आंदोलन को नई दिशा दी। पीयूसीएल (People’s Union for Civil Liberties) और पीयूडीआर (People’s Union for Democratic Rights) जैसे संगठनों ने इस मामले को राष्ट्रीय बहस में ला दिया। पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने लगातार इस पर रिपोर्ट की, जिससे सरकार पर कार्रवाई का दबाव बना।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी यह मामला उठा। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे भारत में “कस्टोडियल टॉर्चर” का प्रतीक बताया और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग ने चिंता जताई और सरकार पर सवाल खड़ा किया।
राज्य की जिम्मेदारी और सुधार की मांग
इस घटना के बाद पुलिस सुधार और जेल सुधार की मांग तेज हुई। यह माना गया कि हिरासत में यातना रोकने के लिए कड़े कानून होने चाहिए। बाद में, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद कस्टोडियल डेथ और टॉर्चर के मामलों में दिशानिर्देश (guidelines) बनाए गए। लेकिन सवाल आज भी वही है- क्या सिस्टम ने इस घटना से सच में सबक लिया?
चार दशक से ज़्यादा बीत चुके हैं, लेकिन “अंखफोड़वा कांड” आज भी न्याय और मानवता के बीच के फर्क की याद दिलाता है। यह बताता है कि जब पुलिस कानून से ऊपर हो जाती है, तो इंसाफ की आंखों पर पट्टी नहीं, तेज़ाब चढ़ जाता है।
भागलपुर के उन 33 लोगों की आंखें अब कुछ नहीं देख सकतीं। भागलपुर के बरारी के रहने वाले विजय बताते हैं कि भागलपुर के गंगा किनारे हुए इस भीषण कांड में कुल 33 लोगों को पुलिस की बर्बरता का शिकार बनाया गया था। स्थानीय लोगों का कहना था कि यह कोई सामान्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि पुलिस का एक गुप्त अभियान था, जिसे अंदरखाने ‘ऑपरेशन गंगाजल’ कहा जाता था। जिसपर बाद में आपरेशन गंगाजल जैसी फिल्में बनीं।
सरकारी सहायता की लंबी प्रतीक्षा
कांड के बाद सरकार ने पीड़ितों के पुनर्वास की बात तो कई बार कही, लेकिन लंबे समय तक कोई ठोस मदद नहीं मिली। शुरुआती दौर में कुछ पीड़ितों को 750 रुपये मासिक पेंशन दी गई, मगर वह भी कुछ समय बाद बंद कर दी गई। इस दर्दनाक घटना के शिकार लोगों के लिए अधिवक्ता रामकुमार मिश्रा ने अदालत में लड़ाई लड़ी। सर्वोच्च न्यायालय की सीनियर एडवोकेट हिंगो रानी ने मिश्रा को सहयोग दिया। जब उन्होंने पीड़ितों की हालत देखी, तो बिना किसी पारिश्रमिक के अपनी कानूनी सेवाएं देने का फैसला किया।
जिनकी आंखों से छिन गईं रोशनी
इंटरनेट मीडिया पर मिली जानकारी के मुताबिक, इस कांड में शालिग्राम तांती, रामस्वरूप मंडल, मंटू हरि, लखन मंडल, पटेल साह, बलजीत सिंह, देवराज खत्री, भोला चौधरी, चमकलाल यादव, पवन सिंह, शालिग्राम साह, उमेश यादव, सहदेव दास, शंकर तांती, शैलेश तांती, वसीम मियां, सल्लो बेलदार, कमल तांती, सुरेश साह, रमन बिंद, दलाल गोस्वामी, श्रीनिवास टीयर, अर्जुन गोस्वामी, बशीर मियां, मांगन मियां, अनिल यादव समेत कुल 33 लोगों की आंखों में तेजाब डाल दिया गया था। इन सभी को उस दौर के अपराधी या लुटेरे के रूप में आरोपित किया गया था।
समाज दो हिस्सों में बंट गया था
इस भयावह घटना ने समाज को दो धड़ों में बांट दिया। एक वर्ग ने इसे “न्याय की कार्रवाई” बताकर समर्थन किया, जबकि दूसरा इसे “अमानवीय अपराध” कहकर विरोध में उतरा। समर्थकों ने तो देवी बाबू धर्मशाला में इस कृत्य को अंजाम देने वालों का सम्मान समारोह तक आयोजित किया – जहां उन्हें घड़ी और रेशमी वस्त्र भेंट किए गए। वहीं विरोध करने वाले नागरिकों ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर इस अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई।







