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दुनियाभर में बढ़ती आर्थिक असमानता: G-20 ग्लोबल इनइक्वेलिटी रिपोर्ट, नीति आयोग और ऑक्सफैम की रिपोर्टें भारत के लिए क्या संकेत देती हैं

आर्थिक असामना रिपोर्ट स्टोरी
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दुनिया भर में आर्थिक असमानता लगातार गहरी होती जा रही है और यह अब सिर्फ एक आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक न्याय के लिए भी एक बड़ा खतरा बन चुका है। अभी हाल में आई जी-20 ग्लोबल इनइक्वेलिटी रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2000 के बाद अर्जित नई वैश्विक संपत्ति का 41% हिस्सा केवल दुनिया के सबसे अमीर 1% लोगों के हाथों में गया है। इसके विपरीत, दुनिया की सबसे निचले तबकों की  50% आबादी के पास केवल 1% संपत्ति है।

रिपोर्ट कहती है कि जहां आर्थिक असमानता चरम पर पहुंचती है, वहां लोकतंत्र कमजोर होता है, संस्थाएं दबाव में आती हैं और समाज कुछ गिने-चुने अरबपतियों के इर्द-गिर्द सिमटने लगता है। यही बात सामाजिक असमानता पर काम करने वाले दुनिया के जाने माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज  भी कहते हैं-

“जब अर्थव्यवस्था कुछ हाथों में केंद्रित हो जाती है, तो लोकतंत्र डगमगाने लगता है, जैसा कि आज अमेरिका में दिख रहा है।”

भारत में असमानता पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ी

जी-20 ग्लोबल इनइक्वेलिटी रिपोर्ट में भारत का ज़िक्र विशेष रूप से किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि 2000 से 2023 के बीच देश के शीर्ष 1% लोगों की संपत्ति में 62% की बढ़ोतरी हुई। इसी अवधि में सबसे निचले तबकों की आय लगभग स्थिर रही या बहुत धीमी गति से बढ़ी।

रिपोर्ट बताती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की तेज़ ग्रोथ और बढ़ते मध्यम वर्ग की कहानी के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है- आय और संपत्ति की खाई तेजी से बढ़ रही है। यह तस्वीर कुछ अन्य रिपोर्टों से भी पता चलता है।

ऑक्सफैम की रिपोर्टः भारत में सुपर-रिच क्लास और मजबूत हुआ, गरीबों के हिस्से में कम

मानवाधिकार और विकास के मुद्दों पर काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ऑक्सफैम की रिपोर्ट ‘Inequality Kills’ और ‘Survival of the Richest’ में कहा गया है-

भारत के सबसे अमीर 1% लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का 40% से अधिक हिस्सा है। महामारी के दौरान जहां एक ओर करोड़ों लोगों की नौकरियां गईं, वहीं अरबपतियों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई।

रिपोर्ट बताती है कि भारत में टैक्स संरचना ऐसी है कि अप्रत्यक्ष कर (GST आदि) का बोझ गरीबों पर अधिक पड़ता है, जबकि संपत्ति टैक्स बेहद कम है। ऑक्सफैम ने सुझाव दिया कि भारत में वेल्थ टैक्स और इनहेरिटेंस टैक्स (विरासत कर) लागू किए जाने चाहिए ताकि असमानता पर नियंत्रण लगाया जा सके।

नीति आयोग की रिपोर्ट: गरीबी कम हुई, परंतु असमानता की चुनौतियां बरकरार

नीति आयोग की मल्टीडाइमेंशनल पावर्टी रिपोर्ट कहती है कि पिछले एक दशक में भारत में बहुआयामी गरीबी में तेज़ गिरावट आई है। लेकिन रिपोर्ट यह भी स्वीकारती है कि-

कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों में आय असमानता बहुत गहरी है। स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा पर असमान पहुंच सामाजिक खाई को और बढ़ाती है। शहरी भारत में ऊंची आय और पूंजी-आधारित नौकरियों ने अमीर वर्ग को और मजबूत बनाया है।

इसका मतलब है कि गरीबी भले कम हो रही हो, लेकिन असमानता लगातार बढ़ रही है और यही आज भारत की सबसे जटिल आर्थिक चुनौती है।

रिपोर्ट की चौंकाने वाली बातें

  • शीर्ष 1% की औसत आय में 12 करोड़ रुपये की वृद्धिः 2000–2023 के बीच दुनिया की नई निर्मित संपत्ति का 41% हिस्सा सबसे अमीर लोगों ने हासिल किया, जबकि निचली आधी आबादी को सिर्फ 1%. इस अवधि में शीर्ष वर्ग की औसत आय में लगभग 12 करोड़ रुपये (13 लाख डॉलर) का इज़ाफ़ा हुआ, जबकि सबसे गरीब आधे हिस्से की वास्तविक वृद्धि मात्र 585 डॉलर रही।
  • अरबपतियों की संपत्ति वैश्विक GDP के 16% के बराबरः दुनिया में आज लगभग 3,000 अरबपति हैं जिनकी कुल संपत्ति वैश्विक GDP के 16% के बराबर है। रिपोर्ट यह भी अनुमान लगाती है कि अगले दशक में दुनिया पहले ट्रिलियनेयर को देख सकती है—ऐसा व्यक्ति जिसकी संपत्ति 100 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो सकती है।
  • हर चौथा व्यक्ति भरपेट भोजन से वंचितः लगभग 2.3 अरब लोग रोज भरपेट भोजन नहीं कर पाते- महामारी के बाद यह संख्या 33 करोड़ और बढ़ी है। भूख और खाद्य संकट की सबसे ज्यादा मार गरीब देशों की है, खासकर अफ्रीका और दक्षिण एशिया में।
  • स्वास्थ्य खर्च 1.3 अरब लोगों को हर साल गरीब बना देता हैः दुनिया की आधी से अधिक आबादी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं से अब भी वंचित है।
    लगभग 1.3 अरब लोग अचानक आने वाले स्वास्थ्य खर्चों के कारण गरीबी में धकेल दिए जाते हैं।

विरासत में मिली संपत्ति असमानता की जड़

रिपोर्ट के अनुसार आज दुनिया में अधिकांश अरबपतियों की संपत्ति उनकी अपनी मेहनत या नई कमाई का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उन्हें विरासत में मिली है। यानी वैश्विक संपत्ति संरचना में ‘इनहेरिटेड वेल्थ’ की भूमिका लगातार बढ़ रही है। अगले दस वर्षों में करीब 70 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की संपत्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के हाथों में स्थानांतरित होने वाली है, वह भी बहुत कम या लगभग बिना टैक्स के। संपत्ति के इस विशाल ट्रांसफर को इतिहास का सबसे बड़ा वेल्थ ट्रांसफर माना जा रहा है।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इतनी बड़ी मात्रा में बिना टैक्स की विरासत मिलने से भविष्य की पीढ़ियों में आर्थिक असमानता और गहरी तथा स्थायी हो जाएगी। अमीर परिवारों की संपत्ति आने वाले दशकों तक सिमटी रहेगी, जबकि नए वर्ग के लोगों के लिए आर्थिक सीढ़ी पर चढ़ना और कठिन होता जाएगा। इसीलिए रिपोर्ट विरासत और संपत्ति कर बढ़ाने की जोरदार सिफारिश करती है।

क्या कहते हैं अर्थशास्त्री

  • नोबेल विजेता जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ कहते हैं कि जब आर्थिक ताकत बहुत कम लोगों के पास जमा हो जाती है, तो लोकतंत्र भी खतरे में पड़ जाता है। क्योंकि राजनीति और फैसले वही लोग नियंत्रित करने लगते हैं जिनके पास पैसा है। उनके मुताबिक, असमानता को कम करने का एक तरीका यह है कि अमीरों पर सही और उचित टैक्स लगाया जाए, ताकि समाज में पैसे का थोड़ा संतुलन बना रहे।

  • मशहूर अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी भी इसी बात से सहमत हैं। उनका कहना है कि असमानता अपने आप खत्म नहीं होती। अगर कोई देश इस खाई को कम करना चाहता है, तो उसे अमीरों पर विरासत टैक्स और संपत्ति टैक्स जैसे फैसले लेने ही पड़ेंगे। पिकेटी का तर्क है कि जिस समाज में पूंजी कुछ परिवारों में ही पीढ़ियों तक जमा होती रहे, वहां गरीबों का ऊपर उठ पाना लगभग नामुमकिन हो जाता है।

  • भारतीय अर्थशास्त्री जयति घोष और प्रभात पटनायक मानते हैं कि भारत में असमानता अब ऐतिहासिक रूप से ऊंचे स्तर पर पहुंच चुकी है। उनका कहना है कि पिछले कुछ सालों में कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती और सरकारी खर्च में कमी ने अमीरों को फायदा पहुंचाया है, जबकि गरीब और कमजोर वर्ग और पीछे रह गए। उनके अनुसार, भारत को शिक्षा और स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च करना चाहिए, और मजदूरों की आय बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।

  • नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी कहते हैं कि सिर्फ टैक्स बढ़ाने से सब कुछ ठीक नहीं होगा। अगर सरकार पब्लिक हेल्थ में सुधार करे, स्कूलों की गुणवत्ता बढ़ाए, छोटे कारोबारियों को आसान लोन दे और रोजगार पैदा करे, तो असमानता स्वाभाविक रूप से कम होने लगेगी।

आर्थिक असमानता को इस तरह से किया जा सकता है दूर

जी-20 की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया में बढ़ती आर्थिक असमानता को कम करने के लिए इन तरीकों पर काम करना जरूरी है। ये कदम आम लोगों तक प्रभाव पहुंचाने में भी मदद करेंगे।

1. असमानता पर नज़र रखने के लिए एक वैश्विक संस्था बने
रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में असमानता कितनी है, कहां-कहां बढ़ रही है और क्यों बढ़ रही है- इस पर लगातार नज़र रखने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संस्था बनाई जाए। यह संस्था ठीक वैसे ही काम करे जैसे जलवायु परिवर्तन पर नज़र रखने वाली IPCC करती है। इससे सरकारों को सही जानकारी मिलेगी और वे बेहतर फैसले ले पाएंगी।
2. अमीरों और बड़ी कंपनियों से ज्यादा टैक्स लिया जाए

रिपोर्ट का कहना है कि अमीर लोगों और बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से उचित और ज्यादा टैक्स वसूला जाए। संपत्ति कर, विरासत कर और टैक्स चोरी पर सख्ती बढ़ाने से सरकारों के पास अधिक पैसा आएगा। फिर इसी पैसे से गरीबों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन जैसी सुविधाएं बेहतर की जा सकती हैं। इससे अमीर और गरीब के बीच का अंतर कम होगा।

3. मजदूरी महंगाई के हिसाब से बढ़े

कई देशों में मजदूरी तय तो है, लेकिन महंगाई बढ़ने पर मजदूरी वही की वही रह जाती है। रिपोर्ट कहती है कि मजदूरी को महंगाई (मुद्रास्फीति) से जोड़ दिया जाए, ताकि दाम बढ़ने पर लोगों की आय भी बढ़े। साथ ही असंगठित क्षेत्र और दूसरे राज्यों/देशों से आने वाले मजदूरों को भी सामाजिक सुरक्षा दी जाए।

4. सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा खर्च करें

कई देशों में इन जरूरी क्षेत्रों पर खर्च या तो घट गया है या बहुत समय से बढ़ा नहीं है। रिपोर्ट कहती है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ी परियोजनाओं पर सरकारें ज्यादा पैसा लगाएंगी तो आम लोगों की जिंदगी बेहतर होगी और अमीर–गरीब का अंतर भी कम होगा।

5. डेटा पारदर्शिता बढ़ाई जाए

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई देशों में आय, संपत्ति और टैक्स से जुड़े आंकड़े पूरी तरह पारदर्शी (ट्रांसपेरेंट) नहीं होते। जब डेटा साफ नहीं होता, तो असमानता की सही तस्वीर सामने नहीं आ पाती और न ही सही नीतियां बन पाती हैं।

इसलिए रिपोर्ट की सिफारिश है कि-

  • देशों को आय और संपत्ति से जुड़े आंकड़े खुले और पारदर्शी तरीके से साझा करने चाहिए।

  • कंपनियों, संपत्तियों और बड़े लेन-देन से जुड़ी जानकारी आसानी से उपलब्ध हो।

  • टैक्स चोरी और अवैध संपत्ति का पता लगाने के लिए देशों को आपस में डेटा साझा करना चाहिए।

रिपोर्ट का मानना है कि अगर डेटा पारदर्शी होगा, तभी असमानता को समझकर सही समाधान बनाए जा सकेंगे। दुनिया और भारत दोनों जगह असमानता एक गंभीर स्तर पर पहुंच चुकी है। जहां शीर्ष 1% के पास अभूतपूर्व संपत्ति जमा हो रही है, वहीं अरबों लोग भोजन, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन से वंचित हैं। स्टिग्लिट्ज़ की यह रिपोर्ट, ऑक्सफैम के निष्कर्ष और नीति आयोग के आंकड़े संकेत देते हैं कि असमानता को रोके बिना न तो लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा और न ही आर्थिक विकास स्थायी हो पाएगा।

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