बिहार में भूजल की गुणवत्ता को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है, इसी बीच पटना के महावीर कैंसर संस्थान ने एक ऐसी स्टडी जारी की है, जिसने चिंता की नई लकीरें खींच दी हैं। संस्थान की रिसर्च के मुताबिक राज्य के कई जिलों में स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध में यूरेनियम के अंश पाए गए हैं। यूरेनियम का यह अंश संभवतः पीने के पानी या स्थानीय खाद्य स्रोतों के जरिए शरीर में पहुंच रहे हैं। यह खुलासा इसलिए अहम है, क्योंकि बिहार के बड़े हिस्से में आज भी लोग हैंडपंप और ट्यूबवेल के पानी पर निर्भर हैं, और अब वही जलस्रोत स्वास्थ्य जोखिमों की संभावित वजह बनकर सामने आए हैं।
18 राज्यों और बिहार के 11 जिलों में खतरे के संकेत
महावीर कैंसर संस्थान के रिसर्च विभाग के प्रमुख डॉ. अशोक कुमार घोष के मुताबिक, ग्राउंडवॉटर में यूरेनियम का बढ़ता स्तर अब भारत के लिए व्यापक चिंता का विषय बन चुका है। देश के 18 राज्यों के 151 जिले इस समस्या से प्रभावित बताए गए हैं, जिनमें बिहार के कई ज़िले लगातार जोखिम के दायरे में आए हैं।
ताज़ा आकलन में बिहार के गोपालगंज, सारण, सीवान, पूर्वी चंपारण, पटना, वैशाली, नवादा, नालंदा, सुपौल, कटिहार और भागलपुर जैसे 11 जिलों में संदूषण के संकेत मिले हैं। यह अध्ययन अक्टूबर 2021 से जुलाई 2024 के बीच हुआ और इसमें पहले से हाई-रिस्क माने जाने वाले भोजपुर, बेगूसराय, खगड़िया, कटिहार और नालंदा को भी शामिल किया गया।
40 महिलाओं के दूध के सैंपलों में पाया गया यूरेनियम
स्टडी में 17 से 35 वर्ष की 40 स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध के नमूने लिए गए। इन नमूनों की जांच उन्नत तकनीक Agilent 7850 LC-ICP-MS से की गई, जबकि एनालिसिस NIPER–हाजीपुर में हुआ। परिणामों में सभी नमूनों में 0 से 6 माइक्रोग्राम प्रति लीटर के बीच यूरेनियम पाया गया। हालांकि स्तनदूध के लिए किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय बेंचमार्क का अभाव है, लेकिन विशेषज्ञ इसे “संभावित स्वास्थ्य जोखिम वाला स्तर” मान रहे हैं।
सबसे अधिक संदूषण कटिहार में दर्ज हुआ, जहां एक नमूने में स्तर 5.25 ug/L तक पहुँच गया।
70% बच्चों में स्वास्थ्य जोखिम की आशंका
शोधकर्ताओं के अनुसार, नमूनों में दर्ज स्तरों से 70% बच्चों में नॉन-कार्सिनोजेनिक स्वास्थ्य प्रभावों की संभावना बनती है।
जिला-वार औसत यूरेनियम स्तर इस प्रकार रहे-
- नालंदा: 2.35 ug/L (सबसे कम)
- खगड़िया: 4.035 ug/L (सबसे अधिक औसत)
- कटिहार: 5.25 ug/L (सबसे अधिक दर्ज स्तर)
रिसर्च टीम का अनुमान है कि माताओं के शरीर में यह तत्व दूषित पानी या उसी क्षेत्र में उगाई गई फसलों के जरिए पहुंच सकता है।
माताओं से घबराने नहीं, सावधान रहने की अपील
महावीर कैंसर संस्थान की मेडिकल निदेशक डॉ. मनीषा सिंह के मुताबिक स्टडी के निष्कर्ष चिंताजनक हैं, लेकिन माताओं को “घबराने की जरूरत नहीं है।”
उनके अनुसार, संस्थान बच्चों में कैंसर उपचार के लिए पहले से ही विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराता है और ऐसी स्टडीज़ का उद्देश्य जोखिमों की समझ बढ़ाना है, न कि डर फैलाना।
क्या बिहार में भूजल की समीक्षा अब हो जाएगी अनिवार्य ?
यह अध्ययन बिहार में जलस्रोतों की सुरक्षा को लेकर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। राज्य के ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी का बड़ा हिस्सा अब भी भूमिगत स्रोतों पर निर्भर है- जिनमें यूरेनियम जैसे धातुओं की मौजूदगी भविष्य में एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अब ज़रूरत है-
- भूजल की नियमित मॉनिटरिंग,
- सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता,
- और सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता प्राइयोरिटी होनी चाहिए
यह स्टडी के साथ एक चेतावनी भी है और साथ ही याद दिलाती है कि साफ़ पेयजल केवल स्वास्थ्य नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से भी जुड़ा मामला है।







