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तिरिंगः झारखंड का वह गांव जहां बेटियों के नाम से जाने जाते हैं घर

तिरिंगः झारखंड का वह गांव जहां बेटियों के नाम से जाने जाते हैं घर
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झारखंड, अक्सर  बेटियों के दर्द, बेबसी और असुरक्षा की कहानी कहती हैं। जहां मानवी तस्करी, दैहिक शोषण, डायन बताकर अत्याचार, लैंगिक हिंसा और सामाजिक दमन- राज्य की इन कड़वी सच्चाइयों ने यहां की बेटियों की छवि हमेशा संघर्ष की पृष्ठभूमि में खड़ी कर दी है। कई बार खबरें इतनी भयावह होती हैं कि समाज की संवेदना को झकझोर देती हैं। ऐसे माहौल में किसी सकारात्मक पहल की कल्पना भी मुश्किल लगती है। लेकिन इसी झारखंड में एक छोटा-सा गांव ऐसा है जिसने अपनी सोच, अपनी परंपरा और अपने साहस से एक ऐसी मिसाल कायम की है जो आज देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। हम बात कर रहे हैं तिरिंग गांव की।

आदिवासी गांव जहां नेम प्लेट पर लिखे हैं बेटियों के नाम

जमशेदपुर से करीब 27 किलोमीटर दूर स्थित तिरिंग गांव ने वह कर दिखाया है जिसकी उम्मीद शायद किसी ने नहीं की थी। आदिवासी बहुल यह गांव अब अपनी बेटियों के नाम से जाना जा रहा है। यहां किसी का पता पूछने पर लोग बेटे या घर के मुखिया या बड़े-बुजुर्ग का नाम नहीं बताते, बल्कि गर्व से अपनी बेटी का नाम लेते हुए घर का पता बताते हैं।

गांव की मिट्टी की दीवारों पर रंग-बिरंगी पुताई और उनके बीच चमकती नेम प्लेटें इस बदलाव की जीवंत पहचान हैं। सुनीता, ललिता, चांदनी, सुजला, फूलमनी, पायल, टुसू… ये नाम सिर्फ बेटियों के नहीं, बल्कि तिरिंग की नई सामाजिक सोच के प्रतीक बन चुके हैं। यह सब ‘मेरी बेटी, मेरी पहचान’ अभियान की वजह से संभव हुआ है। इस अभियान ने तिरिंग को झारखंड का पहला ऐसा गांव बना दिया है जहां हर घर की पहचान उसकी बेटी से होती है।

रंगों में छुपा संदेश: पीली पट्टी पर नीली स्याही

नेम प्लेटों को खास तौर पर पीले रंग की पट्टी पर बनाया गया है, जिस पर नीले रंग से बेटियों और उनकी मां के नाम लिखे गए हैं। इस रंग संयोजन के पीछे गहरी सोच है- पीला रंग आशा, ऊर्जा और उजाले का प्रतीक है जबकि नीला रंग उड़ान और आकाश की असीम संभावनाओं का संकेत देता है। यह रंग संयोजन भी इस संदेश को मजबूत करता है कि बेटियां समाज की रोशनी हैं और उन्हें खुलकर आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए।

कैसे शुरू हुई यह पहल

इस अभियान की शुरुआत जमशेदपुर के डिप्टी कलेक्टर संजय कुमार ने की। लेकिन इसे लागू करने से पहले उन्होंने किसी प्रशासनिक आदेश का इंतज़ार नहीं किया, बल्कि गांव की ग्राम सभा, स्थानीय स्कूलों के शिक्षक, पत्रकार, आंगनवाड़ी सेविका और बाल विकास परियोजना अधिकारी तक से संवाद किया। सभी की सहमति के बाद गांव में एक रैली निकाली गई। महिलाएं शंख फूंकते हुए और पारंपरिक वाद्य बजाते हुए आगे बढ़ीं। यह सिर्फ रैली नहीं थी, यह गांव की सोच का पुनर्जागरण था।

ग्राम प्रधान और लोगों का मानना है कि यह पहल केवल तिरिंग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि पूरे देश में फैलनी चाहिए। वहीं महिलाओं का कहना है कि जहां बेटियों को लोग कहते हैं कि वह तो पराई होती हैं, कल चलके वह दूसरों के घर चली जाएंगी लेकिन अब हमारी बेटियां हमारे घरों की पहचान बन रही हैं। यह न सिर्फ घरों को एक पहचान देने तक सीमित है बल्कि यह नेम प्लेट महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में भी एक पहल है।  

यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहै है, क्योंकि 2011 की जनगणना तिरिंग की एक चिंताजनक तस्वीर दिखाती है। उस समय यहां शिशु लिंगानुपात 1000 लड़कों पर सिर्फ 768 बच्चियां था। महिलाओं की साक्षरता दर केवल 50 फ़ीसदी थी, जबकि पूरे जिले में यह 67 फ़ीसदी तक थी। इन आंकड़ों ने प्रशासन को चेताया और डिप्टी कलेक्टर संजय कुमार ने इसे आधार बनाकर तिरिंग को अभियान की शुरुआत के लिए चुना। संजय का कहना है कि एक नेम प्लेट, जो दिखने में मामूली लगती है, किसी लड़की की पहचान, उसके सम्मान और उसके अस्तित्व को नई रोशनी दे सकती है।

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