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दिल्ली पहुंची इथियोपिया के ज्वालामुखी की राख, फिर भी टेंशन की क्यों नहीं है बात; 5 प्वाइंट में समझिए

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इथियोपिया के हैली गुब्बी ज्वालामुखी के हज़ारों साल बाद हुए विस्फोट की राख अब दिल्ली के आसमान तक पहुंच चुकी है। रविवार सुबह शुरू हुए इस बड़े विस्फोट ने राख और सल्फर डायऑक्साइड का विशाल बादल हवा में छोड़ा, जिसे तेज़ पश्चिमी हवाएं 120 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से अरब सागर होते हुए भारत तक लेकर आईं। दिल्ली में इसके असर से कई उड़ानों के रूट बदले गए और कई प्रभावित हुईं, लेकिन इसे लेकर विशेषज्ञ साफ कह रहे हैं- घबराने और तनाव लेने जैसी कोई बात नहीं है।

क्यों? क्योंकि यह राख सतह के बहुत ऊपर तैर रही है और आपके द्वारा सांस में ली जाने वाली हवा को फिलहाल कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा रही।

यहां समझिए वह 5 कारण, जिनसे दिल्ली वालों को तत्काल चिंता करने की ज़रूरत नहीं है:

क्यों नहीं बढ़ेगा दिल्ली का AQI?

1. राख का बादल जमीन से बहुत दूर- 25,000 से 45,000 फीट की ऊंचाई पर तैर रहा है

दिल्ली के आसमान में दिख रहा यह राख का बादल दरअसल उस हवा की परत में मौजूद है, जो हम सांस लेने वाली हवा से कई गुना ऊपर बहती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि 25,000–45,000 फीट की ऊँचाई पर मौजूद राख का धरती तक आना लगभग असंभव जैसा होता है, क्योंकि भारी कण नीचे गिरने से पहले ही बिखर जाते हैं। दिल्ली की हवा जिस लेयर में सांस बनकर जाती है, वह ज़मीन से करीब 1–2 किलोमीटर की ही ऊँचाई पर होती है। इसलिए चाहे बादल काला दिखे, लेकिन इसका सीधा असर AQI पर पड़ना बेहद कम है।

2. यह राख 2010 के यूरोप वाले ‘हवाई आपदा’ जितनी खतरनाक घनता वाली नहीं है

आईसलैंड के Eyjafjallajökull ज्वालामुखी ने 2010 में इतनी घनी राख उड़ाई थी कि यूरोप की विमान सेवा हफ्तों बंद रही। तुलना करें तो हैली गुब्बी का यह प्लूम काफी हल्का और फैलाव में पतला है। हवा इसे फैलाकर लगातार “डायल्यूट” कर रही है, जिससे इसकी घनता कम होती जा रही है। विमान जरूर इसके असर से बचने को मजबूर हैं, परंतु यह राख उस स्तर की नहीं है कि दिल्ली या भारत के किसी बड़े शहर में स्वास्थ्य आपातकाल पैदा कर दे। इसलिए यह घटना *एयरलाइन डिसरप्शन* है, *हेल्थ डिजास्टर* नहीं।

3. राख की परत सतह से काफी ऊपर उढ़ रही है

दिल्ली की हवा में प्रदूषण पहले से खतरनाक स्तर पर मौजूद है, लेकिन इथियोपिया से आई यह राख उस लो-लेवल लेयर में मिल ही नहीं पा रही जिससे AQI बिगड़े। राख की परत सतह से काफी ऊपर बह रही है, और उसके कण नीचे आने का मौका ही नहीं पा रहे। हवा के ऊपरी और निचले स्तरों के बीच एक “थर्मल लेयर” है जो उन्हें मिलने नहीं देती। यानी दिल्ली का प्रदूषण पहले से खराब है, लेकिन यह राख उस जहरीली लेयर का हिस्सा बन ही नहीं रही—यह एक तरह से ‘स्लाईडिंग ओवर’ कर रही है।

4. सल्फर डायऑक्साइड मौजूद है, इसका खतरा पहाड़ी और ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए अधिक

ज्वालामुखी के प्लूम में सल्फर डायऑक्साइड जरूर है, जो सामान्यतः सांस और आंखों के लिए घातक हो सकता है। लेकिन यह गैसीय परत जिस ऊँचाई पर है, उसका असर भारत के मैदानी शहरों पर लगभग नगण्य है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका ज्यादा प्रभाव नेपाल, हिमालयी चोटियों और ऊँचाई वाले इलाकों में हो सकता है, जहां ऊँची हवाएं नीचे की ठंडी परतों से ज्यादा जल्दी मिल जाती हैं। मैदानों में प्रचलित स्थिर हवा इस गैस को लोगों तक पहुंचने ही नहीं देती। इसलिए दिल्ली जैसी जगहों में खतरा बेहद सीमित है।

5. राख का गुबार भारत से आगे बढ़ रहा है, इसलिए खतरा और कम

यह राख का बादल ओमान, पाकिस्तान और राजस्थान से होता हुआ दिल्ली के ऊपर जरूर पहुँचा, लेकिन अब यह तेजी से पूर्व दिशा की ओर बढ़ रहा है। मौसम विभाग के रडार दिखाते हैं कि यह प्लूम लगातार कमजोर हो रहा है, और हवा के बहाव के साथ पतला होता जा रहा है। जितना ज्यादा यह आगे जाएगा, उतना ही डायल्यूट होगा और इसकी तीव्रता खत्म होती जाएगी। शाम तक इसके देश की सीमा से निकल जाने की संभावना है। यानी जितनी देर दिल्ली के ऊपर से गुजरा, उतनी ही देर में इसका खतरा और कम होता चला गया।

 

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