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न टिकट छोड़ा और न सिंबल; अफज़ल अली की जिद पर झुके महागठबंधन के दो बड़े नेता

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बिहार की राजनीति हमेशा अप्रत्याशित मोड़ों के लिए जानी जाती है, लेकिन दरभंगा जिले की गौराबौराम विधानसभा सीट पर जो दृश्य इन दिनों चुनाव से एक दिन पहले तक देखने को मिला है, उसने अनुभवी सियासतदानों को भी हैरत में डाल दिया है।

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 6 नवंबर को मतदान होने वाला है। इस सीट पर राजद नेता अफ़ज़ल अली खान की जिद और राजनीतिक जीवटता ने इतिहास रच दिया है। इतिहास, जिसमें एक आम कार्यकर्ता की इच्छाशक्ति ने दो राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं को झुकने पर मजबूर कर दिया।

टिकट की जंग और विवाद की शुरुआत

गौराबौराम सीट मुस्लिम बहुल इलाका है, जहाँ यादव-मुस्लिम-मल्लाह समीकरण हमेशा निर्णायक रहा है। इसी समीकरण को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने अफ़ज़ल अली खान को उम्मीदवार बनाने का मन बनाया था। दूसरी ओर, महागठबंधन की सहयोगी पार्टी विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख मुकेश सहनी इस सीट को अपने भाई संतोष सहनी के लिए चाहते थे। उन्हें भरोसा था कि इस सामाजिक समीकरण के सहारे उनके भाई आसानी से जीत सकते हैं।

कुछ दिनों तक चली रस्साकशी के बाद राजद ने अफ़ज़ल को पार्टी का फॉर्म बी (सिंबल ऑथराइजेशन) दे दिया। उसी वक्त वीआईपी ने अपने स्तर पर संतोष सहनी को टिकट थमा दिया। एक ही सीट पर दो उम्मीदवारों को सिंबल मिलने से राजनीतिक हलचल मच गई।

‘नामांकन वापसी’ का दबाव और अफ़ज़ल की जिद

राजद ने अफ़ज़ल से नामांकन वापस लेने को कहा ताकि गठबंधन में सीट समायोजन हो सके। लेकिन अफ़ज़ल ने पार्टी के आदेश को ठुकरा दिया और लालटेन के सिंबल पर ही नामांकन दाखिल कर दिया। राजद नेतृत्व ने कई दौर की बातचीत की, यहाँ तक कि निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर अफ़ज़ल का नामांकन रद्द करने की सिफारिश की, पर कोई नतीजा नहीं निकला।

आख़िरकार राजद ने अफ़ज़ल अली को पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित कर दिया और अपने कार्यकर्ताओं से वीआईपी उम्मीदवार संतोष सहनी के समर्थन की अपील की। लेकिन अफ़ज़ल झुके नहीं। वे लालटेन का झंडा लेकर मैदान में डटे रहे।

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एकतरफ़ा प्रचार और सियासी अकेलापन

तेजस्वी यादव से लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं तक ने गौराबौराम में संतोष सहनी के लिए रैलियाँ कीं। राजद का पूरा संगठन अफ़ज़ल के ख़िलाफ़ उतर आया। बावजूद इसके, अफ़ज़ल अली खान ने न हार मानी, न सिंबल छोड़ा। वे अपने दम पर प्रचार में जुटे रहे, लोगों से सीधे संवाद किया और “विश्वासघात के खिलाफ़ सम्मान की लड़ाई” के नारे के साथ जनता के बीच पहुँचे।

मुकेश सहनी का यू-टर्न: ‘अब हम अफ़ज़ल के साथ हैं’

जब मतदान से ठीक दो दिन पहले माहौल पूरी तरह अफ़ज़ल के पक्ष में झुकता दिखा, तब वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने घोषणा की, “अब महागठबंधन के उम्मीदवार अफ़ज़ल अली खान हैं। वीआईपी पूरी ताकत से उनका समर्थन करेगी।”

संतोष सहनी ने भी नामांकन वापस न लेते हुए प्रतीकात्मक रूप से खुद को पीछे कर लिया। ये दृश्य किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं था, जहाँ टिकट से वंचित एक नेता के सामने दो राष्ट्रीय अध्यक्ष झुक गए।

सहनी की कुर्बानी या सियासी चाल?

मुकेश सहनी के इस फैसले को लेकर राजनीति में दो राय हैं। कुछ लोग इसे ‘कुर्बानी’ कह रहे हैं, तो जानकार इसे ‘रणनीतिक कदम’ मानते हैं। दरअसल, वीआईपी को लेकर मुस्लिम समुदाय में नाराजगी थी, क्योंकि पार्टी ने अपने किसी भी उम्मीदवार को मुस्लिम समाज से नहीं चुना था। गौराबौराम सीट भी वीआईपी को मिलने से मुसलमान असंतुष्ट थे। ऐसे में अफ़ज़ल का समर्थन कर मुकेश सहनी ने मुसलमानों की नाराजगी दूर करने की कोशिश की है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम वीआईपी को अन्य सीटों पर फायदा पहुँचा सकता है और पार्टी को “अल्पसंख्यक हितैषी” छवि मिल सकती है।

स्थानीय समीकरण और BJP की उम्मीदें

गौराबौराम सीट पर 2020 में स्वर्णा सिंह (VIP) जीती थीं, जो बाद में भाजपा में शामिल हो गईं। इस बार उनके पति सुजीत कुमार, जो पूर्व राजस्व अधिकारी हैं, BJP उम्मीदवार हैं। अब जब महागठबंधन के भीतर इस तरह का टकराव दिखा, तो बीजेपी को यहाँ फायदा मिलने की संभावना बताई जा रही है। Times of India की एक रिपोर्ट के अनुसार, अफ़ज़ल की बगावत से वोटों का बँटवारा होने की आशंका है, जिसका लाभ सीधे बीजेपी को मिल सकता है।

गौराबौराम की यह कहानी सिर्फ़ एक विधानसभा सीट की नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति की बदलती प्रकृति की कहानी है।
यह दिखाती है कि गठबंधन की राजनीति में “आदेश मानो या निकाल दिए जाओ” का दौर अब कमजोर पड़ रहा है। अफ़ज़ल अली खान ने अपने दम पर वो कर दिखाया, जो शायद बिहार के किसी भी उम्मीदवार ने अब तक नहीं किया। दो दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों को अपने पक्ष में आने पर मजबूर कर दिया।

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