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बिहार सरकार के पास से 70 हजार करोड़ का हिसाब-किताब गायब; CAG रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

कैग रिपोर्ट बिहार
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नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने बिहार सरकार की वित्तीय प्रणाली, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पिछले आठ वर्षों में राज्य सरकार को योजनाओं और परियोजनाओं के लिए आवंटित ₹70,877.61 करोड़ का उपयोग सरकार अब तक प्रमाणित नहीं कर सकी है।

सरकारी नियमों के अनुसार, किसी भी योजना या प्रोजेक्ट के तहत दी गई राशि का उपयोगिता प्रमाणपत्र (UC) अधिकतम 18 महीनों के भीतर केंद्र को देना अनिवार्य है। लेकिन बिहार में यह प्रक्रिया वर्षों से अटकी पड़ी है। यह सिर्फ हिसाब-किताब में देरी नहीं, बल्कि वित्तीय पारदर्शिता, टैक्सपेयर के पैसे और सरकारी जवाबदेही पर गहरा सवाल है।

49,649 UC पेंडिंग- 70 हजार करोड़ का हिसाब गायब

CAG रिपोर्ट के मुताबिक 31 मार्च 2024 तक 49,649 उपयोगिता प्रमाणपत्र (UC) लंबित थे, जिनकी कुल राशि लगभग 70 हजार करोड़ रुपये है। सरकारी नियम स्पष्ट कहते हैं कि UC लंबित रहने का मतलब है- या तो पैसा खर्च ही नहीं हुआ, या खर्च हुआ लेकिन उसका दस्तावेज मौजूद नहीं है। दोनों स्थितियां गंभीर वित्तीय अनियमितता और प्रक्रियागत विफलता की ओर इशारा करती हैं।

8 साल पुराना हिसाब भी नहीं- 2016–17 के 14 हजार करोड़ अब तक गायब

रिपोर्ट बताती है कि यह समस्या सिर्फ हाल के वर्षों तक सीमित नहीं है। ₹14,452.38 करोड़ की राशि 2016–17 या उससे पहले की है, जिसका उपयोग आज तक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है। यह दिखाता है कि कई विभागों में रिकॉर्ड-कीपिंग और दस्तावेज़ प्रबंधन वर्षों से कमजोर रहा है।

कौन-कौन से विभाग सबसे ज्यादा विवादों में?

CAG ने विभागवार लंबित UC की स्थिति भी उजागर की है, जिनमें कुछ विभागों का प्रदर्शन बेहद खराब पाया गया:

  • पंचायत राज विभाग: ₹28,154.10 करोड़
  • शिक्षा विभाग: ₹12,623.67 करोड़
  • नगर विकास एवं आवास: ₹11,065.50 करोड़
  • ग्राम विकास विभाग: ₹7,800.48 करोड़
  • कृषि विभाग: ₹2,107.63 करोड़

यानी सिर्फ पांच विभागों में ही लगभग 60 हजार करोड़ की उपयोगिता का हिसाब अटका है।

बजट का इस्तेमाल कम, कर्ज ज्यादा 

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि राज्य की कुल देनदारी पिछले वर्ष के मुकाबले 12.34% बढ़ गई है। इसके बावजूद योजनाओं पर वास्तविक खर्च में तेजी नहीं दिखी। वित्त वर्ष 2023-24 के आंकड़े बताने योग्य हैं:

  • कुल बजट अनुमान: ₹3.26 लाख करोड़
  • खर्च हुआ: ₹2.60 लाख करोड़ (79.92%)
  • बची हुई राशि: ₹65,512.05 करोड़
  • कोषागार में वापस लौटी: केवल 36.44%

इसका मतलब यह है कि न केवल योजनाओं का हिसाब नहीं दिया गया, बल्कि आवंटित राशि का बड़ा हिस्सा खर्च भी नहीं हुआ।

UC क्यों जरूरी है? और इसका गायब होना “रेड फ्लैग” क्यों माना जाता है?

यूसी वह दस्तावेज होता है जिसमें विभाग बताता है कि उसे मिली राशि कहां और किस उद्देश्य से खर्च की गई। यह सरकारी फंडिंग की सबसे बुनियादी शर्त है। यदि UC नहीं दिया जाता, तो इसके परिणाम कई हो सकते हैं-

  • योजनाओं की अगली किस्त रोक दी जाती है
  • प्रोजेक्ट्स अधूरे रह जाते हैं
  • फिजिकल वेरिफिकेशन असंभव हो जाता है
  • और सबसे बड़ा खतरा—धन के दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है  

यही कारण है कि वित्त विशेषज्ञ UC की लंबित स्थिति को सरकारी फंडिंग में लाल झंडा (Red Flag) मानते हैं।

टैक्सपेयर और पारदर्शिता सबसे बड़ा सवाल है

टैक्स देने वाला आम नागरिक अपेक्षा करता है कि उसका पैसा सही जगह खर्च हो। लेकिन जब इतनी बड़ी रकम का कोई रिकॉर्ड न मिले, तो सवाल स्वाभाविक होते हैं-

  • क्या योजनाएं जमीन पर चली भी?
  • पैसा कहां और कैसे उपयोग हुआ?
  • यदि योजनाएं अधूरी हैं, तो फंड का क्या हुआ?

विशेषज्ञों का कहना है कि UC न देना वित्तीय पारदर्शिता की सबसे गंभीर विफलताओं में से एक है। यह स्थिति भ्रष्टाचार, लापरवाही और प्रणालीगत खामी—तीनों की ओर इशारा कर सकती है।

राबड़ी देवी ने लगाया था बड़ा आरोप

रिपोर्ट सामने आने के बाद बिहार में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने सरकार पर हमला करते हुए कहा-

 “शुरू से सरकार ने सिर्फ घोटाला ही किया है। 2014 से अब तक सिर्फ घोटाले किए जा रहे हैं। देश की हर चीज़ बेच दी गई है।”   

उनका आरोप है कि बिहार की मौजूदा व्यवस्था में न वित्तीय अनुशासन है, न निगरानी। हालांकि, यह राजनीतिक बयानबाज़ी है, लेकिन तथ्य यह है कि CAG की रिपोर्ट अपने आप में कई सवाल खड़े करती है।

सरकार की प्रतिक्रिया: क्या कहा?

वित्त विभाग के अधिकारियों का कहना है कि-

  • कई विभागों ने UC समय पर जमा नहीं किए
  • उन्हें नोटिस जारी किए गए हैं
  • UC प्रक्रिया को तेज करने के निर्देश दे दिए गए हैं
  • और अगले दो-तीन महीनों में लंबित प्रमाणपत्र जमा करने का प्रयास किया जा रहा है

सरकार का यह भी कहना है कि कुछ प्रोजेक्ट बहुवर्षीय (multi-year) थे, इसलिए उनका दस्तावेज तैयार होने में देरी हुई। हालांकि विशेषज्ञ इसे संतोषजनक जवाब नहीं मानते। क्योंकि UC जमा करना सिर्फ फाइल का काम नहीं, बल्कि जवाबदेही का हिस्सा है।

क्या यह किसी बड़े घोटाले की ओर संकेत करता है?

CAG की रिपोर्ट सीधे “घोटाला” शब्द का इस्तेमाल नहीं करती। लेकिन सवाल ये खड़े करती है कि-

  • इतने बड़े पैमाने पर UC लंबित क्यों?
  • अगर पैसा सही खर्च हुआ, तो दस्तावेज कहां हैं?
  • अगर खर्च नहीं हुआ, तो फंड वापस क्यों नहीं किया गया?
  • और यदि राशि खर्च ही नहीं हुई, तो योजनाओं की प्रगति धीमी क्यों?
  • कई विशेषज्ञ इसे “संभावित वित्तीय अनियमितता” बताते हैं।

विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि “जब तक वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक अनुशासन कड़ाई से लागू नहीं होगा, ऐसे संकट बार-बार सामने आएंगे।

70 हजार करोड़ रुपये का हिसाब गायब होना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। यह उस तंत्र की टूटन को दिखाता है जहां टैक्सपेयर का पैसा या तो खर्च नहीं हो रहा, या उसका रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। यह रिपोर्ट एक चेतावनी है- अगर सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में वित्तीय स्थिति और कमजोर हो सकती है।

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