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बीमा क्षेत्र में 100 फीसदी विदेशी निवेश क्या है और इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?

बीमा क्षेत्र में 100 फीसदी विदेशी निवेश क्या है और इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?
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भारत में आर्थिक नीतियों के नाम पर पिछले तीन दशकों में जो बदलाव किए गए हैं, वे केवल नीतिगत फैसले नहीं रहे, बल्कि उन्होंने देश की सामाजिक, औद्योगिक और रोजगार संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के बाद से भारत ने अपने बाजार विदेशी कंपनियों के लिए लगातार खोले हैं। अब बीमा क्षेत्र में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को मंजूरी देने का फैसला इसी कड़ी का एक अहम पड़ाव है।

केंद्रीय कैबिनेट द्वारा बीमा कंपनियों में विदेशी निवेश की सीमा 74 फीसदी से बढ़ाकर 100 फीसदी करने का फैसला देश की आर्थिक नीतियों में एक बड़े मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। भारत सरकार विदेशी पूंजी को विकास का सबसे बड़ा हथियार मान रही है।

सरकार का कहना है कि इससे बीमा क्षेत्र में पूंजी का प्रवाह बढ़ेगा, प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएं मिलेंगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह फैसला देश के दीर्घकालिक आर्थिक हितों, रोजगार और स्वदेशी उद्योगों के अनुकूल है? पिछले तीन दशकों के अनुभव और उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि विदेशी निवेश का लाभ हमेशा रोजगार, घरेलू उद्योग और आर्थिक स्थिरता के रूप में सामने नहीं आया है। ऐसे में यह फैसला कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

अबतक मात्र 82 हजार करोड़ रुपये का आया है विदेशी निवेश

भारत के बीमा क्षेत्र में अब तक करीब 82 हजार करोड़ रुपये का विदेशी निवेश आ चुका है। वर्ष 2015 तक इस क्षेत्र में एफडीआई की सीमा 26 प्रतिशत थी, जिसे 2015 में 49 प्रतिशत, 2021 में 74 प्रतिशत और अब 100 प्रतिशत तक बढ़ाया जा रहा है। यानी बीमा जैसे संवेदनशील क्षेत्र को धीरे-धीरे पूरी तरह विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिया गया है। यह वही क्षेत्र है जो आम नागरिक की बचत, स्वास्थ्य सुरक्षा और भविष्य की अनिश्चितताओं से सीधे जुड़ा है।

यह निर्णय ऐसे समय में लिया जा रहा है जब भारतीय अर्थव्यवस्था रोजगार और छोटे उद्योगों के संकट से गुजर रही है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर 2023–24 के दौरान कई महीनों तक 7 से 8 प्रतिशत के आसपास बनी रही। ग्रामीण क्षेत्रों में हालात और ज्यादा चिंताजनक रहे। वहीं, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) रिपोर्ट भले ही ‘सामान्य स्थिति’ में बेरोजगारी दर 3–4 प्रतिशत बताती हो, लेकिन यह आंकड़ा रोजगार की गुणवत्ता और स्थायित्व की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दिखाता। अस्थायी, कॉन्ट्रैक्ट और कम वेतन वाली नौकरियों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

LPG पॉलिसी के 30 साल बाद भी कमजोर क्यों है MSME सेक्टर

उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियां लागू हुए 30 वर्ष से अधिक हो चुके हैं। इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार जरूर बढ़ा, लेकिन इसके साथ-साथ छोटे और मंझोले उद्योगों का आधार कमजोर होता चला गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एमएसएमई सेक्टर आज भी देश के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 30 प्रतिशत का योगदान देता है और करीब 11 करोड़ लोगों को रोजगार देता है। इसके बावजूद यही सेक्टर सबसे ज्यादा असुरक्षित स्थिति में है।

कोविड-19 महामारी के बाद यह संकट और गहरा हुआ। भारतीय रिजर्व बैंक और विभिन्न उद्योग संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार, महामारी के बाद करीब 20 से 25 प्रतिशत छोटे और मंझोले उद्योग या तो पूरी तरह बंद हो गए या लंबे समय तक काम नहीं कर पाए। उद्योग संगठनों का आकलन है कि लाखों छोटी इकाइयां बाजार से बाहर हो चुकी हैं। नोटबंदी और जीएसटी के शुरुआती वर्षों में भी बड़ी संख्या में छोटे कारोबार बंद हुए थे, क्योंकि वे नई व्यवस्था और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के साथ तालमेल नहीं बिठा पाए।

बीमा क्षेत्र में विदेशी कंपनियां क्यों करना चाहती हैं निवेश

बीमा क्षेत्र में विदेशी कंपनियों की बढ़ती हिस्सेदारी इसी व्यापक परिदृश्य का हिस्सा है। बीमा ही एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें विदेशी कंपनियों को भारी मशीनरी या अत्याधुनिक तकनीक की जरूरत नहीं होती है। सीमित पूंजी, बड़े उपभोक्ता आधार और लंबी अवधि के निवेश इसे विदेशी कंपनियों के लिए बेहद आकर्षक बनाते हैं। बीमा कंपनियों का मुख्य कारोबार पॉलिसीधारकों से जुटाए गए प्रीमियम और उस धन के निवेश पर आधारित होता है। आशंका यह है कि अगर बीमा कंपनियां पूरी तरह विदेशी स्वामित्व में चली गईं, तो मुनाफे का बड़ा हिस्सा भारत से बाहर जाएगा। रिजर्व बैंक और आर्थिक सर्वेक्षणों में यह स्वीकार किया गया है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां लाभांश और रॉयल्टी के माध्यम से बड़ी मात्रा में पूंजी अपने मूल देशों में वापस ले जाती हैं। इससे देश के भीतर पूंजी संचय कमजोर होता है।

FDI पर राजनीतिक रुख में बदलाव और नीति की विश्वसनीयता

इस फैसले का राजनीतिक पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वर्ष 2004 से 2013 के बीच, जब यूपीए सरकार बीमा और अन्य क्षेत्रों में एफडीआई बढ़ाने की बात कर रही थी, तब भारतीय जनता पार्टी ने इसे संसद और सार्वजनिक मंचों पर राष्ट्र विरोधी नीति बताया था। उस समय कई भाजपा नेताओं ने कहा था कि बीमा जैसे संवेदनशील क्षेत्र को विदेशी कंपनियों के हवाले करना राष्ट्रीय हितों और आर्थिक संप्रभुता के खिलाफ है। बीमा विधेयक को लंबे समय तक इन्हीं तर्कों के आधार पर रोका गया। आज वही पार्टी सत्ता में आकर न केवल एफडीआई की सीमा बढ़ा चुकी है, बल्कि अब 100 प्रतिशत विदेशी निवेश को आर्थिक सुधार बताकर आगे बढ़ा रही है। यह बदलाव राजनीतिक दृष्टिकोण की निरंतरता और नीति की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।

बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत एफडीआई का असर केवल इसी सेक्टर तक सीमित नहीं रहेगा। यदि यही नीति आगे बढ़ी, तो स्वास्थ्य, शिक्षा, बैंकिंग और अन्य सेवा क्षेत्रों में भी विदेशी कंपनियों का दबदबा बढ़ेगा। पहले से ही निजी अस्पतालों की महंगी सेवाएं और निजी शिक्षण संस्थानों की बढ़ती फीस आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। अगर इन क्षेत्रों में भी विदेशी पूंजी का नियंत्रण बढ़ा, तो सेवाओं का उद्देश्य सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अधिकतम मुनाफा बन जाएगा। इसका सीधा असर आम नागरिक पर पड़ेगा।

रोजगार की गुणवत्ता, स्थायित्व और सामाजिक सुरक्षा की चुनौती

रोजगार के मोर्चे पर भी यह स्थिति चिंताजनक है। छोटे उद्योग और स्थानीय सेवा क्षेत्र स्थायी रोजगार और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। इनके कमजोर होने से अस्थायी और असंगठित रोजगार बढ़ता है। आज भारत में रोजगार की समस्या केवल बेरोजगारी दर की नहीं, बल्कि काम की गुणवत्ता, आय की स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा की भी है। विदेशी पूंजी पर अत्यधिक निर्भर मॉडल इस असंतुलन को और बढ़ा सकता है।

यह जरूरी नहीं कि विदेशी निवेश को पूरी तरह नकारा जाए, लेकिन बिना मजबूत नियमन और घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के पूर्ण विदेशी स्वामित्व की अनुमति देना जोखिम भरा है। नीति का उद्देश्य ऐसा होना चाहिए जिसमें निवेश आए, लेकिन मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा देश में पुनर्निवेश हो, रोजगार सृजन को प्राथमिकता मिले और रणनीतिक क्षेत्रों में राष्ट्रीय नियंत्रण बना रहे।बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत एफडीआई का फैसला केवल निवेश का मामला नहीं है। यह देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता, रोजगार संरचना और नीति की दिशा से जुड़ा प्रश्न है। अगर विकास का अर्थ केवल बाजार खोलना और विदेशी पूंजी को आमंत्रित करना रह गया, तो यह आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा से टकराता है। असली सवाल यह है कि यह नीति भारत को मजबूत बनाएगी या धीरे-धीरे आर्थिक रूप से अधिक निर्भर और असुरक्षित। इसी सवाल पर गंभीर और व्यापक सार्वजनिक बहस की जरूरत है।

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