बिहार में पहले चरण की चुनावी रैली 4 नवंबर को थम गई। कल 6 नवंबर को पहले चरण की वोटिंग है। ऐसे में यह देखना बहुत निराशाजनक रहा कि बिहार की जनता और युवाओं की मांग को सभी पार्टियों ने सबसे निचले पायदान पर रखते हुए उम्मीदवारों का चयन किया।
इतना ही नहीं, हर दल की तरफ से चुनावी वादों में अधिकतर बातें धरातल से बहुत दूर दिखाई दीं। कई वादों के पूरा होने की बात सोचकर मजाक लग रहा है। बिहार का इतिहास खुद को धर्म के नाम पर बेदाग देखने का रहा है, जिसमें स्थानीय दलों का भी रोल रहा है। लेकिन, इस बार खुद विपक्ष ने उसे अन्य जगहों की तरह केंद्र में ला दिया।
जो युवा लगातार धर्म और जाति से ऊपर उठ कर युवा आंदोलनों में बेरोजगारी, अन्याय, परीक्षाओं में हुई धांधली, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, सुरक्षा जैसी बुनियादी मांग के लिए लड़ रहे थे। उनको भी बड़े मायने में आशा की किरण के रूप में दिखने वाले विपक्ष ने भी इस चुनाव को जाति, धर्म और बाहुबल में तब्दील कर दिया।
बीपीएससी बहाली और पुलिस बहाली के समय हुई लाठीचार्ज को भी अब कोई देखने सुनने की बात नहीं कर रहा। नए रोजगार के वादों को धरातल पर कैसे लाया जाएगा, ये बात भी मेनिफेस्टो में नहीं दिख रही है। इसके अलावा अन्य कई मुद्दे जैसे बिहार में घरेलू विश्वविद्यालय की खस्ता हालत, जिनमें पढ़ाई के सेशन तक पूरे नहीं होते है। समय पर परीक्षा नहीं है, इनके ऊपर भी बात नहीं की गई।
नदियों और तालाबों में सूखा और बाढ़ पर विस्तृत रोड़मैप की कमी भी साफ दिखाई दे रही है। हालांकि एनडीए ने अपने घोषणा पत्र में कहा है कि हम सरकार बनाने पर पांच साल के अंदर राज्य को बाढ़ मुक्त बना देंगे। परीक्षा लीक और उनमें होने वाली धांधली को कैसे खत्म किया जाए यह भी देखने को नहीं मिला।
यह सब युवाओं द्वारा खड़े किए गए सवाल हैं, जो पिछले दो तीन सालों में बड़े आंदोलनों के जरिए दिखाई दिए। बिहार में रेलवे और आर्मी दोनों के लिए बड़े स्तर पर तैयारी करने वालों की कोई सुनवाई नहीं।
चुनाव अंततः ऐसे मोड़ पर आया, जहां युवा नेता के नाम पर धरातल और नीतियों की समझ नहीं रखने वाले लोग हर पार्टी से खड़े किए गए। कई जगह पढ़े-लिखे लोगों का विरोध उनकी जाति और धर्म देखकर किया गया।
जबकि बिहार इन मुद्दों पर परिवर्तन चाहता था। पर ऐसा लगता है कि सभी पार्टियों ने ठाना है कि आप कुछ भी चाहेंगे हम आपको घसीट कर जाति और धर्म के साथ बाहुबली उम्मीदवारों तक ही सीमित कर देंगे। जहां मुद्दों पर सवाल जवाब की संभावनाओं को खत्म करना आसान हो जाएगा।
यह चुनाव कम खराब उम्मीदवार चयन से शुरू होकर बाहुबलियों की आपसी लड़ाई और खून-खराबे में भी खत्म हो रहा है। जबकि न इसमें बिहार नजर आ रहा है न ही उसकी जरूरतों पर ध्यान देकर उसके भविष्य के निर्माण में मदद की कोई बात।
यह एक बोझिल रूप ले चुका है, जहां पत्रकारिता भी मुद्दों की जगह जाति और बाहुबली उम्मीदवारों को अधिक कवर करती दिखाई दे रही है। साथ ही यह भी पूछ रही है कि दो प्रतिशत वाले को विपक्ष ने डिप्टी सीएम का उम्मीदवार क्यों घोषित किया और 18% वाले में क्या कमी रही?
जबकि ये मुद्दे हमेशा से बीजेपी उठाती थी, जिस पर उसे बिहार काउंटर करता था कि वो कुछ भी कर ले बिहार में धर्म के नाम पर उन्माद नहीं होगा। जन सुराज के रूप में जो बात बिहार के युवाओं की और जनता की शुरू हुई थी, अभी वह भी धूमिल दिखाई पड़ रही है। हालांकि उनके कुछ उम्मीदवारों को देखा जाए तो वो अच्छे रणनीतिकार साबित हो सकते हैं।
आखिर में इस चुनाव में जनता के मुद्दों को सबने मिलकर मोड़ते हुए उसे अपनी पसंद के वर्चस्व में कैसे मोड़ा यह फिर से सोचने वाली बात है। पर फिलहाल यह निराशा की ओर ले जा रही है।







