भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन इस लोकतंत्र की सबसे अहम धुरी यानी हमारी पुलिस आज भी आम जनता के लिए सुरक्षा से ज्यादा खौफ और परेशानी का सबब बनी हुई है। ‘मित्र पुलिस’ के दावों के बीच हकीकत यह है कि आज भी देश का एक साधारण नागरिक अपनी फरियाद लेकर थाने जाने से कतराता है।
थानों में होने वाला दुर्व्यवहार, व्यवहार और पीड़ितों को न्याय देने के बजाय टालने की प्रवृत्ति ने पुलिस और जनता के बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यदि अब पुलिस बल के भीतर आंतरिक सुधार और व्यावहारिक बदलाव नहीं किए गए, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल ढांचा ही खतरे में पड़ जाएगा।
पुलिस हिरासत में 5 साल में 669 मौतें
पुलिसिया बर्बरता और हिरासत में होने वाली हिंसा (Custodial Violence) किसी से छिपा नहीं है। संसद में सरकार द्वारा पेश किए गए आधिकारिक आंकड़े रोंगटे खड़े करने वाले हैं। रिपोर्ट बताती है किपुलिस हिरासत में 2017-22 के बीच कुल 669 लोगों की मौतें हुईं। अगर हम सिर्फ वर्ष 2021-22 के आंकड़ों को देखें तो एक साल में 175 लोगों ने दम तोड़ा है।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, इस प्रताड़ना और क्रूरता का शिकार सबसे ज्यादा समाज का गरीब, पिछड़ा और बेसहारे लोगों पर होता है, जो पुलिस के खिलाफ आवाज उठाने में सक्षम नहीं है।
‘पुलिस आई, भागो!’: कोरोना काल की वो डरावनी सोच
इस व्यवस्था में कमी कितनी गहरी है, इसका अंदाजा कोरोना काल की एक जमीनी हकीकत से लगाया जा सकता है। गांवों में जब पुलिस की गाड़ी आती थी, तो बुजुर्गों से लेकर छोटे-छोटे मासूम बच्चे भी डर के मारे चिल्लाने लगते थे— “पुलिस आई, भागो!”।
जब देश के नौनिहालों के मन में वर्दी की छवि रक्षक की न होकर ‘डंडे मारने वाले’ या ‘पकड़ने वाले’ की बन जाए, तो साफ है कि व्यवस्था की बुनियाद में ही खोट है।
कागजों में सिमटे सुप्रीम कोर्ट के आदेश और कमेटियां
आजादी के बाद से पुलिस को आधुनिक बनाने और राजनीतिक दबाव से मुक्त करने के लिए कई आयोग बने, लेकिन उनकी सिफारिशें आज भी धूल फांक रही हैं। जानिए कुछ प्रमुख समितियों और आयोग के बारे में-
- राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977-82) व मॉडल पुलिस एक्ट (2006): पुलिस अधिनियम 1861 (जो अंग्रेजों ने भारतीयों को दबाने के लिए बनाया था) को बदलने और ‘कम्युनिटी पुलिसिंग’ लागू करने का प्रस्ताव दिया।
- रिबेरो (1998) और पद्मनाभैया समिति (2000): पुलिस की संरचना, जवाबदेही और ट्रेनिंग में बदलाव की वकालत की।
- मलिमथ समिति (2002-03): आपराधिक न्याय प्रणाली (CJS) में व्यापक सुधारों की जरूरत बताई।
- प्रकाश सिंह मामला (2006): सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्देश जारी कर पुलिस को नेताओं के हस्तक्षेप से दूर रखने का आदेश दिया था, जो आज भी पूरी तरह जमीन पर नहीं उतरा।
थर्ड-डिग्री और एनकाउंटर कल्चर का बढ़ता चलन
आज की 21वीं सदी में भी हमारी पुलिस वैज्ञानिक जांच के बजाय आरोपियों से कबूलनामा (Confession) निकलवाने के लिए ‘थर्ड-डिग्री’ जैसे अमानवीय तरीकों पर निर्भर है। इसके साथ ही, समाज में ‘एनकाउंटर’ और न्यायेतर हत्याओं (Extra-judicial killings) को बढ़ावा देने वाली मानसिकता कानून के शासन को कमजोर कर रही है। अपराधियों में डर पुलिस के डंडे का नहीं, बल्कि कानून की निष्पक्षता और अचूक जांच का होना चाहिए।
‘इंसाफ के केंद्र’ कैसे बनेंगे थाने?
विशेषज्ञों और शोध के अनुसार, पुलिस सुधार कोई पेचीदा काम नहीं है, इसके लिए बस प्रशासनिक और राजनीतिक ‘इरादे’ की जरूरत है:
- सॉफ्ट स्किल्स ट्रेनिंग: राज्य के बेहतरीन सेवानिवृत्त IPS अधिकारियों के जरिए थाना स्तर पर साल में कम से कम दो बार पुलिसकर्मियों के व्यवहार और तनाव प्रबंधन की ट्रेनिंग हो।
- डंडे की जगह दिमाग: अपराधियों को दबोचने के लिए मारपीट की जगह साइबर, फोरेंसिक और आधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अनिवार्य किया जाए।
- भाषा में सुधार: सिपाही से लेकर DGP तक, हर नागरिक से शिष्टाचार से बात करें। वर्दी ताकत का नहीं, जिम्मेदारी का अहसास कराए।
- भयमुक्त माहौल: थानों का माहौल ऐसा हो जहां कोई भी महिला, बुजुर्ग या कमजोर व्यक्ति बेखौफ जा सके।








