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बांकीपुर उपचुनाव: क्या भाजपा के अभेद्य किले को ढहा पाएंगे प्रशांत किशोर?

Prashant Kishor
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चुनाव तो सिर्फ एक सीट पर हो रहा है, लेकिन इस सीट पर नजर न सिर्फ बिहार की बल्कि पूरे देश की है। यह बात इन दिनों राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा सुनने को मिल रही है। वजह भी साफ है। पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव। यह उपचुनाव अब सिर्फ एक विधायक चुनने का चुनाव नहीं रह गया है। यह चुनाव कई नेताओं की साख, कई दावों और बिहार की भविष्य की राजनीति से भी जुड़ गया है।

31 साल से भाजपा का अभेद्य किला है बांकीपुर

इस सीट पर पिछले 31 साल से भाजपा का कब्जा रहा है। 1995 के बाद से यहां किसी भी दूसरी पार्टी को जीत नहीं मिली। अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद यहां उपचुनाव होने जा रहा है। ऐसे में भाजपा के सामने अपनी सबसे सुरक्षित सीटों में से एक को बचाने की चुनौती है।

पहली बार चुनाव लड़ने उतरे हैं प्रशांत किशोर

दूसरी तरफ जन सुराज ने बड़ा दांव खेल दिया है। पार्टी ने ऐलान किया है कि उसके सूत्रधार प्रशांत किशोर खुद बांकीपुर से चुनाव लड़ेंगे। यह पहली बार होगा जब देश के सबसे चर्चित चुनावी रणनीतिकारों में गिने जाने वाले प्रशांत किशोर खुद जनता से वोट मांगेंगे। अब तक वे दूसरे नेताओं को चुनाव जिताने की रणनीति बनाते रहे हैं, लेकिन इस बार उनकी अपनी राजनीतिक परीक्षा होगी।

यह चुनाव इसलिए भी अहम है क्योंकि 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली थी। चुनाव के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठा था कि जब पूरी पार्टी प्रशांत किशोर के चेहरे पर चुनाव लड़ रही थी, तब उन्होंने खुद चुनाव क्यों नहीं लड़ा? विरोधियों ने इसे मुद्दा बनाया और समर्थकों के एक हिस्से में भी निराशा दिखी। अब बांकीपुर से मैदान में उतरकर प्रशांत किशोर उसी सवाल का जवाब देना चाहते हैं।

जीत-हार से तय होगी पीके की राजनीतिक साख

अगर वे जीत जाते हैं तो यह सिर्फ उनकी पहली चुनावी जीत नहीं होगी। इसका मतलब होगा कि पीके ने भाजपा के 31 साल पुराने गढ़ में सेंध लगा दी। लेकिन अगर वे हारते हैं तो विरोधियों को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि चुनाव जिताने की रणनीति बनाना और खुद चुनाव जीतना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए बांकीपुर का उपचुनाव सामान्य उपचुनाव नहीं माना जा रहा। इसके नतीजे से यह संकेत भी मिलेगा कि बिहार की राजनीति आगे भी पारंपरिक दलों के इर्द-गिर्द ही रहेगी या प्रशांत किशोर तीसरे राजनीतिक विकल्प के तौर पर अपनी जगह बना पाएंगे।

आखिर बांकीपुर सीट इतनी अहम क्यों है?

पटना शहर के बीचों-बीच स्थित बांकीपुर विधानसभा सीट को भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। 1995 से लेकर अब तक यहां भाजपा लगातार जीतती रही है। कई बार यहां मुकाबला हुआ, लेकिन नतीजा नहीं बदला। अब पहली बार ऐसा मौका आया है जब इस सीट पर भाजपा को एक ऐसे उम्मीदवार का सामना करना पड़ सकता है, जिसकी पहचान सिर्फ एक नेता की नहीं, बल्कि देश के बड़े चुनावी रणनीतिकार की भी है। यही वजह है कि इस चुनाव को लेकर पटना से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक हलचल तेज है।

भाजपा के लिए प्रतिष्ठा, जन सुराज के लिए अस्तित्व की लड़ाई

भाजपा के लिए यह सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है। यह उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट रही है। ऐसे में अगर पार्टी यहां हारती है तो विपक्ष इसे बड़ा राजनीतिक झटका बताएगा। वहीं जन सुराज के लिए यह मौका है कि वह यह दिखा सके कि विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद भी उसकी राजनीतिक जमीन बनी हुई है और वह मुख्य मुकाबले में बने रहने की क्षमता रखती है। अगर पार्टी यहां अच्छा प्रदर्शन करती है या जीत जाती है तो उसका मनोबल भी बढ़ेगा।

2025 की गलती सुधारने की कोशिश

पिछले विधानसभा चुनाव के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की हुई थी कि तीन साल तक पूरे बिहार में पदयात्रा करने वाले प्रशांत किशोर खुद चुनाव क्यों नहीं लड़े? उनके समर्थकों का एक बड़ा वर्ग चाहता था कि वे खुद मैदान में उतरें। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उस समय जन सुराज की ओर से कहा गया था कि अगर प्रशांत किशोर खुद चुनाव लड़ते तो बाकी सीटों पर प्रचार नहीं कर पाते।

अब हालात बदल चुके हैं। इस बार उन्होंने खुद चुनाव लड़ने का फैसला किया है। इस फैसले के जरिए उन्होंने उन सवालों का जवाब देने की कोशिश की है, जो पिछले विधानसभा चुनाव के बाद लगातार उठते रहे थे।

क्या सम्राट चौधरी के नेतृत्व पर भी होगा फैसला?

प्रशांत किशोर ने इस चुनाव को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कामकाज से भी जोड़ने की कोशिश की है। उनका कहना है कि पिछले विधानसभा चुनाव में सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं थे। बाद में राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के बाद वे मुख्यमंत्री बने। इसलिए अब पहली बार जनता को उनके नेतृत्व पर राय देने का मौका मिलेगा।

अगर भाजपा सीट बचा लेती है तो पार्टी इसे सम्राट चौधरी के नेतृत्व पर जनता की मुहर बताएगी। लेकिन अगर सीट हाथ से निकलती है तो विपक्ष इसे सरकार के खिलाफ जनमत के तौर पर पेश करेगा।

क्या शहरी मतदाता पीके को मौका देगा?

बांकीपुर पूरी तरह शहरी सीट है। यहां अक्सर मतदान प्रतिशत कम रहता है और कई बार तो 40 प्रतिशत से भी कम वोट पड़े हैं। हालांकि यहां का मतदाता पढ़ा-लिखा माना जाता है और स्थानीय मुद्दों पर भी वोट करता है। पिछले कुछ महीनों से प्रशांत किशोर लगातार इन इलाके में मोहल्लों में सभाएं कर रहे हैं। उनके कार्यकर्ता भी सड़क, नाली-पानी, सफाई, ट्रैफिक, जल निकासी और नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं।

भरत तिवारी मामला कितना असर डालेगा?

जानकारों का कहना है कि भरत तिवारी मामले में खुलकर बोलने से प्रशांत किशोर को सवर्ण समाज के एक हिस्से का समर्थन मिल सकता है। हालांकि चुनाव में सिर्फ एक मुद्दा जीत-हार तय नहीं करता, लेकिन अगर किसी नेता के पक्ष में पहले से माहौल बन रहा हो तो ऐसे मुद्दे उसे अतिरिक्त बढ़त दिला सकते हैं।

सरकार के खिलाफ नाराजगी कितना बदलेगी समीकरण?

पिछले कुछ महीनों में राज्य सरकार कई मुद्दों पर विपक्ष के निशाने पर रही है। बात चाहे स्टेट हाईवे पर टोल टैक्स, पुलों पर टैक्स, पंचायतों में टैक्स लगाने की चर्चा, बांसघाट में शमसान के निजीकरण को लेकर, बेरोजगारी, पेपर लीक, नीट छात्रा मामला, आर्थिक मुश्किलें और दूसरी कई बातें लगातार उठती रही हैं। इसके अलावा इथेनॉल नीति और प्रतियोगी परीक्षाओं में आई दिक्कतों को लेकर भी युवाओं में नाराजगी की चर्चा होती रही है। प्रशांत किशोर इन सभी मुद्दों को चुनाव प्रचार में प्रमुखता से उठाते भी रहे हैं। अगर जनता इन मुद्दों को गंभीरता से लेती है तो इसका फायदा कहीं न कहीं पीके को मिल सकता है।

महागठबंधन की रणनीति पर भी रहेगी नजर

यह चुनाव सिर्फ भाजपा और जन सुराज के बीच की लड़ाई नहीं होगा। सबकी नजर इस बात पर भी रहेगी कि महागठबंधन क्या करता है। कांग्रेस के बारे में चर्चा है कि वह इस सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं उतारने वाली है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल राजद को लेकर है। क्या राजद यहां अपना उम्मीदवार उतारेगी या नहीं। ये सवाल इसलिए भी है क्योंकि प्रशांत किशोर, लालू यादव और तेजस्वी यादव के पर काफी बयानबाजी होती रही है। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि राजद बिना मुकाबले के मैदान छोड़ देगा।

भाजपा की सबसे बड़ी ताकत क्या होगी?

भाजपा के लिए यह सीट सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है। यह उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट है। इसलिए पार्टी पूरी ताकत लगाएगी।भाजपा के पास मजबूत संगठन है। बूथ स्तर तक उसका नेटवर्क काम करता है। अगर पार्टी का पूरा शीर्ष नेतृत्व चुनाव में उतर गया तो मुकाबला काफी कठिन हो जाएगा।

आखिर मुकाबले में किसका पलड़ा भारी?

आज की तारीख में साफ तौर पर किसी की जीत तय नहीं कही जा सकती। भाजपा के पास मजबूत संगठन, पुराना वोट बैंक और सत्ता की ताकत है। दूसरी तरफ प्रशांत किशोर के पास नई राजनीति का दावा, खुद की पहचान और बदलाव की उम्मीद लेकर चलने वाले समर्थकों का साथ है। अब यह तो समय ही तय करेगा कि किसका पलड़ा भारी रहेगी।

बांकीपुर का नतीजा बिहार की राजनीति को क्या संदेश देगा?

नतीजा चाहे जो भी हो, बांकीपुर उपचुनाव का असर एक सीट तक सीमित नहीं रहेगा। यह चुनाव भाजपा की संगठनात्मक ताकत, प्रशांत किशोर की राजनीतिक स्वीकार्यता और बिहार में तीसरे राजनीतिक विकल्प की संभावनाओं का भी अहम पैमाना बनेगा। यही वजह है कि आने वाले दिनों में बिहार ही नहीं, देश की राजनीति की नजर भी इस एक सीट पर टिकी रहने वाली है।

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